कैंसर की जाांच कैसे की जाती है?
स्क्रीनिंग, टेस्ट और डायग्नोसिस की पूरी प्रक्रिया
अक्सर कैंसर जैसे रोग का नाम सुनते ही अधिकांश लोगों के मन में भय के साथ यह प्रश्न उठता है – क्या कैंसर की समय रहते पहचान की जा सकती है?
तो इसके उत्तर में कह सकते हैं – जी हाँ।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में ऐसी अनेक उन्नत जांचें उपलब्ध हैं, जिनकी सहायता से कैंसर का पता उसकी प्रारंभिक अवस्था में लगाया जा सकता है। यही कारण है कि आज के समय में चिकित्सा विशेषज्ञ कैंसर की स्क्रीनिंग (Screening) और समय पर जांच पर विशेष जोर देते हैं; जितनी जल्दी कैंसर का पता चलता है, उसके सफल उपचार की संभावना भी उतनी ही अधिक बढ़ जाती है।
हालांकि कई प्रकार के कैंसर में प्रारंभिक अवस्था में कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। ऐसे में नियमित स्वास्थ्य जांच और स्क्रीनिंग जीवनरक्षक सिद्ध हो सकती है। विशेष रूप से चालीस वर्ष से अधिक आयु के लोगों, तंबाकू या धूम्रपान करने वालों, पारिवारिक जोखिम वाले व्यक्तियों तथा अन्य उच्च जोखिम समूहों को चिकित्सकीय सलाह के अनुसार समय-समय पर जरूर स्क्रीनिंग करवानी चाहिए।
क्या होता है स्क्रीनिंग?
स्क्रीनिंग का अर्थ होता है – ऐसे व्यक्ति की जांच करना जिसमें अभी तक कैंसर के कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं दे रहे हों, ताकि प्रभावित व्यक्ति की बीमारी का शुरुआती अवस्था में ही पता लगाया जा सके। इसका उद्देश्य कैंसर को उस समय पहचानना है जब उसका उपचार अधिक प्रभावी व अपेक्षाकृत सरल हो। अब तो विभिन्न प्रकार के कैंसर के लिए अलग-अलग स्क्रीनिंग परीक्षण की पद्धतियाँ उपलब्ध हैं। ये टेस्ट इस प्रकार हैं:
1. पैप स्मीयर (Pap Smear) एवं एचपीवी (HPV) टेस्ट
यह जांच महिलाओं में गर्भाशय ग्रीवा (सर्वाइकल) कैंसर की प्रारंभिक पहचान के लिए की जाती है। पैप स्मीयर से गर्भाशय ग्रीवा की कोशिकाओं में होने वाले शुरुआती असामान्य परिवर्तनों का पता लगाया जा सकता है, जबकि एचपीवी टेस्ट कैंसर से जुड़े वायरस की पहचान करने में सहायता करता है। आपको बता दें कि इन नियमित जांचों से इस कैंसर की रोकथाम और शीघ्र उपचार की संभावना काफी बढ़ जाती है।
2. मैमोग्राफी (Mammography)
मैमोग्राफी स्तन का विशेष प्रकार का एक्स-रे परीक्षण होता है जिससे स्तन कैंसर का पता प्रारंभिक अवस्था में लगाया जा सकता है। कई बार यह ऐसी छोटी गांठों को भी पहचान लेता है जिन्हें हाथ से महसूस नहीं किया जा सकता।
3. कोलोनोस्कोपी (Colonoscopy)
यह जांच बड़ी आंत (कोलन) एवं मलाशय के कैंसर की पहचान के लिए की जाती है। इस प्रक्रिया में एक लचीली कैमरा-युक्त नली के माध्यम से बड़ी आंत के भीतर का निरीक्षण किया जाता है। यदि कोई संदिग्ध पॉलीप दिखाई दे, तो उसे उसी समय हटाकर जांच के लिए भेजा जा सकता है, जिससे भविष्य में कैंसर बनने का खतरा भी बहुत कम हो जाता है।
4. लो-डोज सीटी स्कैन (Low-dose CT Scan)
लंबे समय से धूम्रपान करने वाले या फेफड़ों के कैंसर के अधिक जोखिम वाले व्यक्तियों में लो-डोज सीटी स्कैन फेफड़ों के कैंसर की प्रारंभिक पहचान के लिए उपयोगी माना जाता है।
कैंसर की पुष्टि के लिए कौन-कौन सी जांचें की जाती हैं? यदि स्क्रीनिंग या रोगी के लक्षणों के आधार पर कैंसर की आशंका होती है, तो चिकित्सक आगे की विस्तृत जांच व परीक्षण करने की सलाह देते हैं।
रक्त परीक्षण (Blood Test)
इस परीक्षण में रक्त की जांच से शरीर की सामान्य स्थिति का आकलन किया जाता है। कुछ विशेष परिस्थितियों में ट्यूमर मार्कर (Tumor Markers) भी जांचे जा सकते हैं, लेकिन केवल रक्त परीक्षण के आधार पर कैंसर की पुष्टि नहीं की जाती।
इमेजिंग जांच (Imaging Tests)
कैंसर की स्थिति, आकार तथा उसके फैलाव का आकलन करने के लिए विभिन्न इमेजिंग तकनीकों का उपयोग किया जाता है, जिसमें शामिल हैं –
उपरोक्त जांचों से चिकित्सकों को यह समझने में सहायता मिलती है कि कैंसर कहाँ स्थित है, उसका आकार कितना है तथा क्या वह शरीर के अन्य भागों तक फैल चुका है।
बायोप्सी: कैंसर की अंतिम और सबसे विश्वसनीय जांच
कैंसर की अंतिम और निश्चित पुष्टि केवल बायोप्सी (Biopsy) द्वारा ही की जाती है। इसमें संदिग्ध ऊतक का एक छोटा नमूना लेकर प्रयोगशाला में सूक्ष्मदर्शी (Microscope) के माध्यम से जांचा जाता है। बायोप्सी से यह पता चलता है कि वास्तव में कैंसर है या नहीं, कैंसर किस प्रकार का है और कैंसर कितना आक्रामक है।
उपचार की कौन-सी पद्धति सबसे उपयुक्त रहेगी?
यह धारणा पूरी तरह से गलत है कि बायोप्सी कराने से कैंसर फैल जाता है। आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों से की गई बायोप्सी सुरक्षित और विश्वसनीय प्रक्रिया है तथा सही उपचार की योजना बनाने के लिए यह अत्यंत आवश्यक होती है।
इम्यूनोहिस्टोकेमिस्ट्री (IHC) और आनुवंशिक जांच
कई बार केवल बायोप्सी ही पर्याप्त नहीं होती। ऐसे मामलों में इम्यूनोहिस्टोकेमिस्ट्री (IHC) तथा आनुवंशिक (Genetic/Molecular) परीक्षण किए जाते हैं। इन जांचों से यह जानकारी मिलती है कि कैंसर की कोशिकाओं में कौन-से विशेष प्रोटीन मौजूद हैं, कौन-से जीन परिवर्तन (Gene Mutations) हुए हैं, रोगी के लिए टार्गेटेड थेरेपी या इम्यूनोथेरेपी जैसी आधुनिक उपचार पद्धतियाँ कितनी प्रभावी हो सकती हैं। आज के समय में प्रिसीजन मेडिसिन (Precision Medicine) से इन जांचों का महत्व लगातार बढ़ता जा रहा है।
क्या हर गांठ कैंसर होती है?
इसका उत्तर है – नहीं।
यहाँ पर यह जानना भी जरूरी है कि शरीर में बनने वाली हर गांठ कैंसर नहीं होती। अनेक गांठें सामान्य (Benign) होती हैं और उनमें कैंसर जैसी विशेषताएँ नहीं होतीं। इसी प्रकार हर असामान्य जांच रिपोर्ट का अर्थ भी कैंसर नहीं होता। इसलिए किसी भी रिपोर्ट को स्वयं समझने या इंटरनेट के आधार पर कोई निष्कर्ष निकालने के बजाय विशेषज्ञ चिकित्सक से परामर्श लेनी चाहिए।
समय पर जांच क्यों आवश्यक होती है?
कैंसर की शीघ्र पहचान ही सफल उपचार की सबसे मजबूत नींव है। प्रारंभिक अवस्था में पाए गए अनेक कैंसर का उपचार अधिक प्रभावी, कम जटिल तथा अपेक्षाकृत कम खर्चीला होता है। नियमित स्क्रीनिंग से कई प्रकार के कैंसर का पता लक्षण प्रकट होने से पहले ही लगाया जा सकता है, जिससे रोगी के पूर्ण स्वस्थ होने की संभावना काफी हद तक बढ़ जाती है।
आवश्यक सावधानियाँ
यह सावधानी और जानकारी रखना अत्यंत आवश्यक है कि कैंसर की जांच केवल एक परीक्षण से नहीं होती, बल्कि यह एक सुव्यवस्थित प्रक्रिया है जिसमें स्क्रीनिंग, शारीरिक परीक्षण, रक्त जांच, इमेजिंग जांच, बायोप्सी तथा आवश्यकता अनुसार IHC एवं आनुवंशिक परीक्षण शामिल हो सकते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी असामान्य लक्षण, गांठ, लगातार दर्द, असामान्य रक्तस्राव, बिना कारण वजन कम होने या लंबे समय तक बने रहने वाले किसी भी लक्षण को कभी नज़रअंदाज़ न करें। समय पर चिकित्सकीय परामर्श, उचित जांच और सही निदान से ही अधिकांश कैंसरों का उपचार अधिक सफल बनाया जा सकता है।
याद रखें
कैंसर की शीघ्र पहचान ही जीवन बचाने का सबसे प्रभावी उपाय है। नियमित स्क्रीनिंग, समय पर जांच और विशेषज्ञ चिकित्सक की सलाह से कैंसर पर समय रहते विजय निश्चित ही प्राप्त की जा सकती है।
