फेफड़ों यानी लंग्स का कैंसर: कारण, लक्षण, जांच, उपचार और इसके बचाव
फेफड़ों का कैंसर (Lung Cancer)
आज के दौर में विश्वभर में कैंसर से होने वाली मृत्यु के प्रमुख कारणों में फेफड़ों का कैंसर भी एक प्रमुख कारण है। भारत में भी इसके मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है। यह केवल धूम्रपान करने वालों की बीमारी नहीं है, बल्कि कई बार धूम्रपान न करने वाले लोग भी इस कैंसर से प्रभावित हो सकते हैं। अच्छी बात यह है कि यदि इसकी पहचान प्रारंभिक अवस्था में हो जाए, तो उपचार की सफलता की संभावना में काफी इजाफा हो सकता है।
फेफड़ों का कैंसर क्या है?
जब फेफड़ों की कोशिकाएँ अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं और एक गांठ (ट्यूमर) का निर्माण कर देती हैं, तब उसे फेफड़ों का कैंसर कहा जाता है। यदि समय पर उपचार न मिले, तो यह कैंसर शरीर के अन्य अंगों जैसे मस्तिष्क, हड्डियों, यकृत और अधिवृक्क ग्रंथियों तक भी फैल सकता है।
मुख्य रूप से इसके दो प्रकार होते हैं:
- नॉन-स्मॉल सेल लंग कैंसर (NSCLC) – यह सबसे सामान्य प्रकार है और लगभग 80–85% मामलों में पाया जाता है।
- स्मॉल सेल लंग कैंसर (SCLC) – यह अपेक्षाकृत कम पाया जाता है, लेकिन तेजी से फैल सकता है।
फेफड़ों के कैंसर के प्रमुख कारण
सबसे बड़ा जोखिम कारक धूम्रपान है, लेकिन इसके अतिरिक्त भी कई कारण हैं:
- बीड़ी, सिगरेट, हुक्का या अन्य तंबाकू उत्पादों का सेवन
- परोक्ष धूम्रपान (Passive Smoking), अर्थात दूसरों के धुएँ के संपर्क में रहना
- वायु प्रदूषण
- एस्बेस्टस, सिलिका, डीज़ल धुआँ और कुछ औद्योगिक रसायनों के लंबे समय तक संपर्क में रहना
- रेडॉन गैस का संपर्क (कुछ क्षेत्रों में)
- परिवार में फेफड़ों के कैंसर का इतिहास
- फेफड़ों की कुछ पुरानी बीमारियाँ
इसके होने वाले प्रमुख लक्षण
फेफड़ों के कैंसर के शुरुआती चरण में कई बार कोई स्पष्ट लक्षण नहीं होते। जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है, निम्न लक्षण दिखाई दे सकते हैं:
- लगातार दो से तीन सप्ताह से अधिक रहने वाली खाँसी
- पुरानी खाँसी का अचानक बढ़ जाना
- खाँसी के साथ खून आना
- साँस लेने में तकलीफ या साँस फूलना
- सीने में लगातार दर्द
- आवाज़ बैठ जाना
- बार-बार फेफड़ों में संक्रमण या निमोनिया होना
- बिना कारण वजन कम होना
- भूख कम लगना
- अत्यधिक कमजोरी और थकान
यदि इनमें से कोई भी लक्षण लगातार बने रहें, तो विशेषज्ञ चिकित्सक से तुरंत परामर्श लेना जरूरी होता है।
फेफड़ों के कैंसर की जाँच
रोग की पुष्टि के लिए डॉक्टर निम्न जाँचें कर सकते हैं:
- छाती का एक्स-रे
- सीटी स्कैन (CT Scan)
- PET-CT
- ब्रोंकोस्कोपी
- बायोप्सी (कैंसर की पुष्टि के लिए महत्वपूर्ण जाँच)
- आणविक (Molecular) एवं जीन परीक्षण, जिससे लक्षित उपचार (Targeted Therapy) का निर्णय लिया जा सकता है।
आवश्यक उपचार
इसका उपचार रोग की अवस्था, कैंसर के प्रकार और मरीज की शारीरिक स्थिति पर निर्भर करता है।
1. सर्जरी
यदि कैंसर प्रारंभिक अवस्था में हो और सीमित क्षेत्र में हो, तो ऑपरेशन द्वारा कैंसरग्रस्त भाग को निकाल दिया जाता है।
2. कीमोथेरेपी
विशेष दवाओं के माध्यम से कैंसर कोशिकाओं को नष्ट या नियंत्रित किया जा सकता है।
3. रेडियोथेरेपी
उच्च ऊर्जा वाली किरणों से कैंसर कोशिकाओं को नष्ट किया जाता है।
4. टारगेटेड थेरेपी
कुछ मरीजों में जीन परीक्षण के आधार पर विशेष दवाओं का उपयोग किया जाता है, जो कैंसर कोशिकाओं को लक्षित करती हैं।
5. इम्यूनोथेरेपी
यह उपचार शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को कैंसर सेल से लड़ने के लिए सक्रिय करता है और कुछ मरीजों में अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो सकता है।
क्या फेफड़ों के कैंसर से बचाव संभव है?
कई मामलों में इससे बचाव संभव है। इसके लिए:
- धूम्रपान बिल्कुल न करें।
- यदि धूम्रपान करते हैं, तो इसे छोड़ने के लिए चिकित्सकीय सहायता लें।
- परोक्ष धूम्रपान से बचें।
- प्रदूषित वातावरण में सुरक्षा उपाय अपनाएँ।
- कार्यस्थल पर औद्योगिक सुरक्षा नियमों का पालन करें।
- संतुलित आहार लें और नियमित व्यायाम करें।
- लंबे समय तक खाँसी या अन्य लक्षणों को कभी भी नज़रअंदाज़ न करें।
क्या धूम्रपान छोड़ने से इसमें लाभ मिलता है?
जी हाँ, बिल्कुल। धूम्रपान छोड़ने के बाद समय के साथ फेफड़ों के कैंसर का जोखिम कम होने लगता है। जितनी जल्दी धूम्रपान छोड़ा जाए, उतना अधिक लाभ मिलता है। इसलिए धूम्रपान छोड़ने में कभी भी अनावश्यक देरी नहीं करनी चाहिए।
आवश्यक सावधानियाँ
फेफड़ों का कैंसर एक गंभीर बीमारी है, लेकिन समय पर पहचान और आधुनिक उपचार से अनेक मरीज बेहतर और लंबा जीवन जी सकते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लगातार रहने वाली खाँसी, खून वाली खाँसी या साँस की तकलीफ जैसे लक्षणों को केवल सामान्य लक्षण समझकर बिल्कुल अनदेखा न करें।
याद रखने योग्य
धूम्रपान छोड़ना, प्रदूषण से बचाव, समय पर जाँच और विशेषज्ञ चिकित्सक से उपचार ही फेफड़ों के कैंसर के विरुद्ध सबसे प्रभावी उपाय हैं। कैंसर के प्रति सतर्कता और जागरूकता ही जीवन की सबसे बड़ी सुरक्षा बन सकती है।
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