कैंसर की शुरुआती लक्षण क्या है? आईए जानें
समय पर पहचान ही जीवन की सबसे बड़ी सुरक्षा
कैंसर आज विश्व भर में मृत्यु के प्रमुख कारण में से एक बन चुका है। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि यदि इसकी पहचान प्रारंभिक अवस्था (Early Detection) में हो जाए तो अनेक प्रकार के कैंसर का सफलतापूर्वक उपचार संभव है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में जांच एवं उपचार की उन्नत तकनीक ने अब यह संभव कर दिया है कि कैंसर के ठीक होने की संभावनाएं पहले से कहीं अधिक बढ़ चुकी है। इसलिए कैंसर के प्रति जागरूकता, उसके शुरुआती लक्षणों की पहचान और समय पर चिकित्सा चिकित्सकीय परामर्श ही इस बीमारी से बचाव के लिए सबसे अत्युत्तम व प्रभावी उपाय है। दुर्भाग्यवश, कैंसर के शुरुआती चरण में अक्सर कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते।
यही कारण है कि इसे कई बार “साइलेंट डिजीज” भी कहा जाता है। हालांकि शरीर समय-समय पर कुछ ऐसे संकेत अवश्य देता है, जिन्हें यदि गंभीरता से लिया जाए तो रोग का पता प्रारंभिक अवस्था में लगाया जा सकता है। प्रायः ऐसे केसों में अक्सर देखा जाता है कि कैंसर का एक कोई निश्चित लक्षण नहीं पाया जाता । इसके लक्षण इस बात पर निर्भर करते हैं कि कैंसर शरीर के किस अंग में विकसित हो रहा है। फिर भी कुछ सामान्य चेतावनी संकेत ऐसे हैं, जिन्हें कभी भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यदि शरीर के किसी भाग में बिना दर्द की गांठ या सूजन दिखाई दे, लगातार दो से तीन सप्ताह तक खांसी बनी रहे, आवाज बैठ जाए, निगलने में कठिनाई हो, बिना किसी कारण तेजी से वजन कम होने लगे, अत्यधिक कमजोरी एवं थकान बनी रहे, किसी घाव का लंबे समय तक न भरना, मल या मूत्र त्याग की आदतों में अचानक परिवर्तन, मल या मूत्र में रक्त आना, बार-बार असामान्य रक्त स्राव होना या महिलाओं में अनियमित योनी रक्त स्राव दिखाई दे तो तुरंत योग्य चिकित्सक से मिलकर परामर्श लेना जरूरी हो जाता है। यह भी देखा जाता है कि अलग-अलग प्रकार के कैंसर के लक्षण भी भिन्न-भिन्न होते हैं। जैसे मुख के कैंसर में मुंह के भीतर सफेद या लाल चकत्ते, लंबे समय तक न भरने वाला छाला, मुंह खोलने या चबाने में कठिनाई तथा दर्द हो सकता है। तो वहीं फेफड़ों के कैंसर में लगातार खांसी, खून वाली खांसी, सांस फूलना और सीने में दर्द प्रमुख संकेत हैं। और वहीं स्तन कैंसर में स्तन या बगल में गांठ, त्वचा का सिकुड़ना, निप्पल का अंदर धंसना अथवा असामान्य स्राव महत्वपूर्ण लक्षण हो सकते हैं। गर्भाशय ग्रीवा (सर्वाइकल) कैंसर में अनियमित रक्तस्राव, संभोग के बाद रक्तस्राव तथा श्रोणि (पेल्विक) क्षेत्र में दर्द दिखाई दे सकता है। बड़ी आंत के कैंसर में लंबे समय तक का कब्ज रहने ,दस्त या मल में रक्त तथा पेट संबंधित लगातार शिकायतें बने रहने पर भी यह कैंसर होने की संभावना हुआ चेतावनी हो सकती है।
कैंसर की पहचान कैसे कर सकते हैं ?
देखा जाता है कि कैंसर की पुष्टि केवल लक्षणों के आधार पर नहीं की जाती। बल्कि आधुनिक चिकित्सा जांचों द्वारा ही इसकी पुष्टि की जा सकती है। इनमे सबसे महत्वपूर्ण जांच बायोप्सी (Biopsy) है, जिसमें संदिग्ध ऊतक का छोटा नमूना लेकर सूक्ष्मदर्शी से उसकी जांच की जाती है। इसे कैंसर की पुष्टि का स्वर्ण मानक (Gold Standard) माना जाता है। इसके अतिरिक्त आवश्यकता के अनुसार रक्त परीक्षण, एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन, फिर एमआरआई, पेट-सीटी, एंडोस्कोपी, कोलोनोस्कोपी, मैमोग्राफी तथा पैप स्मीयर जैसी जांच की प्रक्रिया अपनाई जाती है। कुछ विशेष प्रकार के कैंसर में ट्यूमर मार्कर तथा आनुवंशिक (Genetic) परीक्षण भी उपयोगी सिद्ध होते हैं। इन जाटों के आधार पर ही कैंसर का प्रकार उसकी अवस्था तथा शरीर में उसके फैलाव का सही आंकलन कर सकते में आसानी होती है।
कैंसर का उपचार कैसे होता है?
कैंसर का उपचार रोग के प्रकार, उसकी अवस्था, रोगी की उम्र और समग्र स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। कैंसर के प्रारंभिक अवस्था में कई कैंसर शल्य चिकित्सा अर्थात सर्जरी से पूरी तरह ठीक हो सकते हैं। इसके पश्चात आवश्यकता पड़ने पर रेडिएशन थेरेपी, कीमोथेरेपी, टार्गेटेड थेरेपी, इम्यूनोथेरेपी, हार्मोन थेरेपी अथवा इनका संयुक्त उपयोग भी किया जाता है। आज चिकित्सा विज्ञान में व्यक्तिगत (Personalized) उपचार की दिशा में भी तेजी से प्रगति हुई है, जिससे मरीजों को अधिक प्रभावी व सुरक्षित उपचार अब उपलब्ध कराया जा रहा है।
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कैंसर के बचाव उपाय और सावधानियां
कैंसर के सभी मामलों को रोक नहीं जा सकता, लेकिन लगभग एक तिहाई मामलों में रोगी के स्वास्थ्य जीवन से शैली अपनाने से इसके बचाव के लिए प्रभावी उपाय किया जा सकता है। वही प्रभावित व्यक्ति को तंबाकू एवं धूम्रपान से पूरी तरह दूरी बनाए रखनी होगी, वही शराब का सेवन ना करें या सीमित रूप में करें। फिर वही संतुलित एवं पौष्टिक भोजन करना चाहिए, नियमित व्यायाम करना चाहिए। वजन को संतुलित व स्वस्थ बनाए रखें तथा पर्याप्त नींद लेना आवश्यक है। हेपेटाइटिस-बी और एचपीवी (HPV) जैसे आवश्यक टीके लगवाना भी कुछ प्रकार के कैंसर के जोखिम को कम कर सकता है। तेज धूप से त्वचा की सुरक्षा करना तथा अनावश्यक विकिरण या रेडिएशन से बचे रहना भी बहुत महत्वपूर्ण है। विशेषज्ञों का मानना है कि 40 वर्ष की आयु के बाद जिन लोगों के परिवार में कैंसर का इतिहास है या जो तंबाकू धूम्रपान अथवा अन्य जोखिम कारकों के संपर्क में हैं, उन्हें खासकर नियमित कैंसर स्क्रीनिंग करना जरूरी रहता है। कई बार स्क्रीनिंग के माध्यम से कैंसर का पता उस अवस्था में चल जाता है, जब कोई लक्षण भी दिखाई नहीं देते। यही समय उपचार के लिए सबसे अच्छा होता है। यह याद रखना आवश्यक है कि कैंसर का प्रारंभिक लक्षण हमेशा दर्द नहीं होता। शरीर में होने वाला कोई भी असामान्य और लगातार बना रहने वाला परिवर्तन एक महत्वपूर्ण चेतावनी हो सकता है।इसलिए स्वयं उपचार करने, घरेलू नुस्खों पर निर्भर रहने या लक्षणों को अनदेखा करने के बजाय समय पर योग्य चिकित्सक से परामर्श लेना ही सबसे समझदारी भरा निर्णय है। याद रखें “कैंसर की जल्दी पहचान, सफल उपचार की सबसे मजबूत नींव है।” कैंसर के प्रति जागरूकता, नियमित जांच और समय पर उपचार ही कैंसर के विरुद्ध सबसे प्रभावी उपाय है।
